भारत रतन अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर विशेष

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    एक सुलझे राजनेता, प्रखर वक्ता और बेहतरीन कवि अटल बिहारी वाजपेयी 25 दिसंबर 1924 में जन्मे थे. भारत के दसवें प्रधानमंत्री रहे अटल जी को भारत रत्न भी दिया जा चुका है. आज उनकी जयंती पर यह उनकी कविताओं की कुछ पंक्तियाँ विशेष लेख जो जीवन के हर कदम पर नई सीख देती हैं.

    भरी दोपहरी में अँधियारा

    सूरज परछाई से हारा

    अंतर्मन का नेह निचोड़ें

    बुझी हुई बाती सुलगाएं

    आओ फिर से दिया जलाएं

     

     

    मेरे प्रभु!

    मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,

    गैरों को गले न लगा सकूं,

    इतनी रुखाई कभी मत देना

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    दो दिन मिले उधार में

    घंटों के व्यापार में

    क्षण क्षण का हिसाब लूं

    या निधि शेष लौटाऊं में

    राह कौनसी जाऊं मैं

     

     

    क्यों न मैं क्षण क्षण को जियूं

    कण कण में बिखरे सौन्दर्य को पियूं

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    होने, न होने का क्रम,

    इसी तरह चलता रहेगा

    हम हैं, हम रहेंगे

    यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा

     

     

    दाँव पर सभी कुछ लगाया है

    रुक नहीं सकते

    टूट सकते हैं मगर,

    हम झुक नहीं सकते

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    टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी,

    अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी

    हार नहीं मानूंगा

    रार नहीं ठानूंगा

    काल के कपाल पे लिखा मिटाता हूँ

    गीत नया गाता हूँ

     

     

    मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

    ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं

     

     

    बाधाएं आती हैं आयें

    घिरें प्रलय की घोर घटायें

    पाओं के नीचे अंगारे

    सर पर बरसें यदि ज्वालायें

    निज हाथों में हसते हसते

    आग लगा कर जलना होगा

    कदम मिला कर चलना होगा

     

     

    स्वयं को दूसरों की दृष्टि से

    मैं देख पाता हूँ,

    न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

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